नई टिहरी (12) मिनी स्विट्जरलैंड… *क्या अभी गुंज़ाइश वाकी है**

विक्रम बिष्ट
नई टिहरी। असली सवाल यह है कि हमारे पास जो आज है क्या उसमें हम कुछ बेहतर चीजें जोड़ सकते हैं ? अथवा रोते-झींकते, झपटते रहें?
राजा सुदर्शन शाह और उनके मंत्रि-सलाहकारों को मालूम था कि राज महल और राजकर्मियों के निवास के साथ राजधानी में व्यवसाय और अन्य सामाजिक गतिविधियों के लिए भी जगह- सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए। इसलिए 700 में 30 मकान बनाकर लोगों को किराए पर दिए गए। फिर लोग आते रहे शहर बन गया। प्रताप नगर , कीर्ति नगर और नरेन्द्र नगर बसाए गए।
बताया जाता है कि नरेंद्र शाह जब अपनी राजधानी नवनिर्मित नरेंद्र नगर ले गये तो टिहरी शहर की रौनक कुछ कम हो गई थी। राजाओं के अपने-अपने नाम पर बसाए तीनों नगरों की अपनी-अपनी कथाएं हैं । सिर्फ शासन केंद्र के रूप में शहर नहीं बनते। शहर की अपनी आत्मा होती है। कीर्ति नगर से नई टिहरी तक ….क्या सीखे हैं। टिहरी मृत्युदंड की सजा सुनाये जाने के दशकों बाद तक पूरी शान से जीती रही, स्व बलिदान तक।
बहराल नई टिहरी की जादुई किताब में एक दावा बिजली की भूमिगत लाइन का भी है। शायद सुव्यवस्थित बिजली आपूर्ति के साथ झूलते तारों से नई टिहरी को मुक्त रखने के उद्देश्य से यह किया गया था। लेकिन टेस्टिंग के दिन ही धड़ाम.. । उस दौरान टीएचडीसी की बिजली विंग के मुखिया मिस्टर कोठारी (डीजीएम) का मासूम सा जबाब था ठेकेदारी समस्या।
बहरहाल जैसे तैसे कुछ समय के लिए भूमिगत व्यवस्था से बिजली चालू रही। फिर सभी खंभों सहित गायब हो गयी। दाढ़ी वाले बाबा की सिफारिशी फाइल की तरह। जारी….।