चीड़ के जंगल काटकर काश्तकारों को फल पट्टियों हेतु आवंटित किया जाए-लोकेंद्र जोशी

नई टिहरी/घनसाली। उत्तराखंड आंदोलनकारी व उक्रांद नेता लोकेंद्र जोशी का सुझाव है कि काश्तकारी भूमि की कमी को दूर करने हेतु चीड़ के जंगलों को कटवाया जाय और वह भूमि स्थानीय काश्तकारों को फल फट्टियों हेतु आवंटित कर, सरकार को नएं राजस्व ग्राम बनाने का कार्य करना चाहीए।
कहा कि वन अधिनियम तो हर तरह से पहाड़ों के लिए अभिशाप है। दूसरी ओर जन संख्या लगातार बढ़ रही है। पुस्तैनी कृषि योग्य और खेत खलियान टूट फुट होने और आपदा से प्रभावित होकर नदी घाटियों और पर्वतीय क्षेत्रों से बह गए हैं। परिणाम स्वरूप कास्तकारी भूमि न के बराबर रह गई है।

वन्य जंतुओं की तरह चीड़ के जंगलों के पुवाल/पेल्टू के कारण स्थानीय काश्तकारों को खेती करनी मुश्किल हो रखी है। चीड़ के पेडों से बनाग्नि बहुत अधिक होती है और जंगलों में आग उसके पिल्टू /पतियों और फलों ( छेन्तियालों) से बहुत जल्दी फैलती है जिससे अन्य उपयोगी चारा पति वाले पेड़ पौधों के साथ जंगली पशु पक्षियों के साथ बेशकीमती जड़ी बूटियों को भी नुकशान पहुंचता है।
दूसरी ओर वन अधिनियम के कारण अपने खेतों से पेड़ों को काटने पर पाबन्दी होने के कारण ( शायद अब छूट दी गई है ) चीड़ के जंगलों में बेतहाशा वृद्धि हो गई और चीड़ के पेड़ों के कारण सारे उपयोगी पेड़ पौधे फसल आदि के साथ जल स्रोत सूख रहें हैं।
पलायन रुके तो रुके कैसे ?
जहां एक ओर खेती बड़ी की कमी हो रही है तो दूसरी ओर रोजगार के साधन विकसित नहीं किए जा रहे हैं। ऐसे में पलायन रुके तो कैसे रुके? गम्भीर चिंतन मनन का बिषय है। इसलिए सरकार को चीड़ के जंगलों को कटवा कर, कृषि योग्य भूमि का विस्तार करके नएं राजस्व ग्रामों को बनाने हेतु सार्थक प्रयास शीघ्र शुरू करने होंगे। तभी पलायन रुकने की बात सार्थक होगी।