- गोविंद पुंडीर
टिहरी गढ़वाल 25 जुलाई। उत्तराखंड के इतिहास में 25 जुलाई का दिन अमर शहीद श्री देव सुमन के अद्वितीय बलिदान के लिए सदैव स्मरणीय रहेगा। प्रतिवर्ष इस दिन पूरे प्रदेश में सुमन दिवस मनाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। उनका जीवन अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और जनअधिकारों के लिए किए गए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है।
टिहरी गढ़वाल के जौल गाँव में 25 मई 1915 को जन्मे श्री देव सुमन का बचपन का नाम श्रीदत्त बडोनी था। युवावस्था से ही उन्होंने टिहरी रियासत की दमनकारी नीतियों का विरोध शुरू कर दिया। उनका मानना था कि जनता को स्वतंत्रता, समानता और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने का पूरा अधिकार है।
रियासत की निरंकुश व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष के कारण उन्हें गिरफ्तार कर टिहरी जेल में बंद कर दिया गया। जेल में अमानवीय व्यवहार और जन अधिकारों की मांग को लेकर उन्होंने 3 मई 1944 से आमरण अनशन शुरू किया। लगातार 84 दिनों तक अन्न-जल का त्याग करते हुए उन्होंने कठिन यातनाएं सहीं, लेकिन अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
आखिरकार 25 जुलाई 1944 को उन्होंने मातृभूमि और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान उत्तराखंड के जनआंदोलनों और लोकतांत्रिक चेतना की सबसे प्रेरणादायी विरासतों में गिना जाता है।
आज भी श्री देव सुमन का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका संघर्ष सिखाता है कि सत्य, न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए साहस, त्याग और दृढ़ संकल्प आवश्यक हैं।
सुमन दिवस के अवसर पर उत्तराखंड के विभिन्न जनपदों में श्रद्धांजलि सभाएं, प्रभात फेरियां, विचार गोष्ठियां और पुष्पांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाएं, शिक्षण संस्थान तथा सामाजिक संगठन अमर शहीद श्री देव सुमन के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनके आदर्शों को अपनाने का संकल्प लेते हैं।
अमर शहीद श्री देव सुमन का बलिदान केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए लोकतंत्र, जनसरोकार और मानवाधिकारों की रक्षा का अमर संदेश है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और राष्ट्रसेवा के लिए सदैव प्रेरित करता रहेगा।




