पंच केदार परंपरा का प्राचीन धाम, जहाँ शिव ने वृद्ध रूप में दिए थे पांडवों को दर्शन
टिहरी गढ़वाल, 06 जून 2026 । गढ़वाल हिमालय की मनोरम वादियों में, बालगंगा और धर्मगंगा के पवित्र संगम तट पर स्थित बूढ़ा केदार केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। टिहरी जनपद के भिलंगना विकासखंड अंतर्गत घनसाली क्षेत्र में अवस्थित यह प्राचीन शिवधाम पंच केदार परंपरा का प्रारंभिक अथवा पांचवां धाम माना जाता है। प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित यह स्थल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और दिव्य अनुभूति प्रदान करता है।
एक संत की स्मृतियों में जीवंत धाम
बूढ़ा केदार की यात्रा के दौरान रावल अमरनाथ योगी से प्राप्त मार्गदर्शन आज भी इस धाम की स्मृतियों को विशेष बना देता है। उन्होंने मंदिर के इतिहास, परंपराओं और आध्यात्मिक महत्व को अत्यंत सरलता और गहराई से समझाया था। उनके हालिया निधन के बाद यह स्मृति और अधिक भावुक तथा अमूल्य हो गई है। उनकी वाणी आज भी इस पवित्र धाम की आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ जुड़ी हुई प्रतीत होती है।
जब शिव ने धारण किया वृद्ध का रूप बूढ़ा केदार मंदिर समिति के सदस्य मनमोहन रावत के अनुसार, स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के उपरांत पांडव अपने कुल और ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने हेतु भगवान शिव की खोज में हिमालय पहुंचे। किंतु भगवान शिव उनसे रुष्ट थे और दर्शन देने से बचने के लिए एक वृद्ध पुरुष का रूप धारण कर इस क्षेत्र में तपस्या करने लगे।
कहा जाता है कि जब पांडव इस स्थान पर पहुंचे तो वह वृद्ध पुरुष ध्यानमग्न हो गया और उसी क्षण एक विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ। पांडवों ने उसी शिवलिंग में भगवान शिव के दर्शन किए। इसी घटना के कारण यह स्थान ‘बूढ़ा केदार’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्थानीय मान्यता है कि इस धाम के दर्शन के बिना चारधाम यात्रा भी पूर्ण नहीं मानी जाती।
*विशाल प्राकृतिक शिवलिंग और अद्वितीय परंपराएँ* मंदिर समिति अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह नेगी बताते हैं कि यहां स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग उत्तर भारत के सबसे विशाल प्राकृतिक शिवलिंगों में से एक माना जाता है। इस शिवलिंग में वृद्ध शिव, गणेश, नंदी, पांचों पांडव और द्रौपदी की आकृतियाँ स्वाभाविक रूप से उकेरी हुई प्रतीत होती हैं, जो इसे अत्यंत विशिष्ट बनाती हैं। गढ़वाली स्थापत्य शैली में निर्मित यह मंदिर लकड़ी और पत्थर की उत्कृष्ट नक्काशी का सुंदर उदाहरण है। मंदिर परिसर में नाथ संप्रदाय के संतों की समाधियाँ स्थित हैं तथा मान्यता है कि योग और साधना की महान परंपरा के प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ ने भी यहां तपस्या की थी।
इस मंदिर की एक और अनूठी विशेषता यह है कि यहां परंपरागत रूप से ब्राह्मण नहीं, बल्कि नाथ संप्रदाय से दीक्षित राजपूत पुजारी पूजा-अर्चना का कार्य संपन्न करते हैं, जो भारतीय मंदिर परंपराओं में एक विशिष्ट उदाहरण माना जाता है। प्रकृति की गोद में बसा दिव्य धाम समुद्र तल से लगभग 1,535 मीटर (5,035 फीट) की ऊँचाई पर स्थित बूढ़ा केदार नई टिहरी से लगभग 90 किलोमीटर दूर है। चारों ओर फैले देवदार के घने वन, सीढ़ीनुमा खेत, कल-कल बहती नदियाँ और हिमालयी वातावरण इस स्थल को आध्यात्मिक साधना और आत्मिक शांति का आदर्श केंद्र बनाते हैं। मेले और लोकआस्था का केंद्र महाशिवरात्रि यहां का प्रमुख पर्व है, जब हजारों श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन हेतु पहुंचते हैं। इसके अतिरिक्त जुलाई माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाला तीन दिवसीय विशाल मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान है। यहां पूजित गुरु कैलापीर देवता लगभग 180 गांवों के इष्टदेव माने जाते हैं। दीपावली के लगभग एक माह बाद आयोजित होने वाला उनका भव्य मेला धार्मिक आस्था, लोकसंस्कृति और सामुदायिक एकता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। साहसिक पर्यटन का भी प्रवेश द्वार बूढ़ा केदार धार्मिक महत्व के साथ-साथ ट्रैकिंग और प्रकृति प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। यहां से महासर ताल, सहस्त्र ताल, जराल ताल और मनझार ताल जैसे हिमालयी उच्च हिमतालों की ट्रैकिंग यात्राएँ संचालित होती हैं। ऋषिकेश और नई टिहरी से घनसाली तक सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। घनसाली से मंदिर तक वाहन सुविधा उपलब्ध है, जबकि अंतिम चरण में लोहे के पुल से लगभग एक किलोमीटर का सुंदर और सहज पैदल मार्ग श्रद्धालुओं का स्वागत करता है। गढ़वाल की जीवंत विरासत बूढ़ा केदार केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक पहचान, लोकविश्वास, स्थापत्य कला और प्राकृतिक धरोहर का अद्भुत संगम है। यहां पहुंचकर श्रद्धालु जहां भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करते हैं, वहीं हिमालय की शांत गोद में प्रकृति और अध्यात्म के अनूठे मिलन का भी साक्षात्कार करते हैं। यही कारण है कि बूढ़ा केदार आज भी आस्था, इतिहास और संस्कृति के पथ पर गढ़वाल की अमूल्य धरोहर के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
*** संक्षिप्त परिचय / बायोडाटा *** नाम: गोविन्द सिंह पुण्डीर संपादक: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल टिहरी। उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार। पत्रकारिता अनुभव: सन 1978 से सतत सक्रिय पत्रकारिता। विशेषता: जनसमस्याओं, सामाजिक सरोकारों, संस्कृति एवं विकास संबंधी मुद्दों पर गहन लेखन और रिपोर्टिंग। योगदान: चार दशकों से अधिक समय से प्रिंट व सोशल मीडिया में निरंतर लेखन एवं संपादन
वर्तमान कार्य: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान करना।