कविता: “आसमान को छू आती है”

Govind Pundir
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गढ़ निनाद न्यूज़

कुंआ   बहुत   गहरा   है,
उससे  पानी  कैसे  खींचे?

सूख रहा मन का विरूआ, 
कैसे उसको सींचे?

चाहत थी हरियाली की, 
उग आया है रेगिस्तान!

हुई अचानक जाने कैसे? 
बस्ती   यह  सुनसान!

अधरों पर थे गीत और 
कदमों  में   गति  जीवन  की।

स्वाभिमान के साथ समन्वित, 
सहज प्रतीती अपनेपन  की।

सब कुछ बदला-बदला सा, 
और पराया लगता अपना!

देख नहीं पाया अरसे  से, 
कोई प्यारा सा सपना।

होता कितना पीड़ादायक? 
सपनों  का अकाल  मर जाना!

जर्जर तन बोझिल मन  से, 
जीवन का भार उठा पाना।

जिजीविषा लेकिन अब भी, 
तन की सीमा को झुठलाती है।

धरती से भर कर उड़ान, 
नित आसमान को छू आती है।

एक छुअन तन-मन को मेरे, 
फिर-फिर कर देती अनुरंजित।

यौवन का वह राग पुराना,
अणु-अणु में हो जाता व्यंजित।

 ** सोमवारी लाल उनियाल ** 

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*** संक्षिप्त परिचय / बायोडाटा *** नाम: गोविन्द सिंह पुण्डीर संपादक: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल टिहरी। उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार। पत्रकारिता अनुभव: सन 1978 से सतत सक्रिय पत्रकारिता। विशेषता: जनसमस्याओं, सामाजिक सरोकारों, संस्कृति एवं विकास संबंधी मुद्दों पर गहन लेखन और रिपोर्टिंग। योगदान: चार दशकों से अधिक समय से प्रिंट व सोशल मीडिया में निरंतर लेखन एवं संपादन वर्तमान कार्य: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान करना।
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