शूलिनी शोधकर्ता ने प्रमाणित किए हिमालयी पौधों के औषधीय गुण

Govind Pundir
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अस्थमा, बुखार, पीलिया और संक्रमण के उपचार में उपयोगी साबित

देहरादून, 29 अगस्त 2025। हिमालय की वादियों में पाए जाने वाले वे औषधीय पौधे, जिन्हें पीढ़ियों से आदिवासी समुदाय पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग करते आए हैं, अब वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित हो रहे हैं। शूलिनी विश्वविद्यालय (सोलन) की सहायक प्रोफेसर डॉ. राधा ने अपने शोध में पाया है कि ये पौधे अस्थमा, बुखार, पीलिया, शारीरिक दर्द, श्वसन समस्याओं और संक्रमण जैसी बीमारियों के प्रबंधन में कारगर हैं।

डॉ. राधा, जो विश्वविद्यालय के हर्बेरियम एवं ड्रग म्यूज़ियम की प्रभारी भी हैं, ने बताया कि इन पौधों में एंटीऑक्सीडेंट, एंटीमाइक्रोबियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-डायबिटिक, एंटी-कैंसर और हेपाटोप्रोटेक्टिव (यकृत-संरक्षण) गुण प्रचुर मात्रा में पाए गए हैं। वर्ष 2025 में उन्होंने चार पेटेंट भी दर्ज कराए हैं, जो पारंपरिक ज्ञान को फंक्शनल फूड्स और प्राकृतिक औषधीय उत्पादों में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

सेमल का फूल सबसे आशाजनक
शोध में सेमल के फूल को विशेष महत्व मिला है। यह फूल फाइबर, फिनॉल्स और फ्लेवोनॉयड्स से भरपूर है, जो एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गतिविधियों में सहायक हैं। इसी आधार पर डॉ. राधा ने सेमल के फूल और सेब से पोषक जैम और रेडी-टू-सर्व ड्रिंक तैयार की है, जिनमें कोई कृत्रिम रंग या संरक्षक नहीं मिलाए गए। वैज्ञानिक समीक्षाओं ने इस फूल में एंटी-डायबिटिक, एंटी-कैंसर और एंटीमाइक्रोबियल क्षमता को भी प्रमाणित किया है।

प्रिंसेपिया यूटिलिस और गिलोय के नतीजे
प्रिंसेपिया यूटिलिस (हिमालयी चेरी) में ऐसे सक्रिय तत्व पाए गए जो क्लेब्सिएला न्यूमोनिया और स्ट्रेप्टोकोकस पायोजीनस जैसे जीवाणुओं को रोकने में सक्षम हैं। वहीं, गिलोय के अर्क को अल्ट्रासोनिक तकनीक से तैयार कर 13 सक्रिय एंटीमाइक्रोबियल यौगिक सुरक्षित रखे गए, जिसने बहु-दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया पर भी असर दिखाया।

डॉ. राधा ने कहा,
“हिमालय की जनजातियाँ पारिस्थितिक ज्ञान का जीवित भंडार हैं। उनकी पारंपरिक औषधियों को अब प्रयोगशाला में वैज्ञानिक प्रमाण मिल रहा है। हमारा लक्ष्य है कि यह ज्ञान आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल में योगदान दे और जैव-विविधता भी सुरक्षित रहे।”

1,600 पौधों का दस्तावेजीकरण
डॉ. राधा ने अपने एथ्नोबॉटनिकल सर्वेक्षण में 1,600 से अधिक हिमालयी पौधों का दस्तावेजीकरण किया है। उनकी पुस्तक “A Survey on Ethnoveterinary Medicines Used by the Tribal Migratory Shepherds of Northwestern Himalaya” इस क्षेत्र की पहली विस्तृत रिपोर्ट है, जिसमें प्रवासी गद्दी-बकरवाल चरवाहों द्वारा पशुधन रोगों के उपचार में प्रयुक्त 181 पौधों का विवरण दर्ज है।

खतरे में कई दुर्लभ पौधे
अनियंत्रित कटाई से कुटकी, जेंटियन, श्वेत हिमालयी कुमुदिनी और जंगली जौ जैसे पौधों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। इसलिए वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और संरक्षण अब अत्यावश्यक हो गया है।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग
यह शोध कार्य एडवांस्ड नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) के सहयोग से हुआ है तथा बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया (देहरादून), डॉ. वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी (नौनी), शूलिनी विश्वविद्यालय के फार्मास्यूटिकल साइंसेज स्कूल और स्टैनफोर्ड, क्लेमसन, टेक्सास टेक तथा स्पेन के यूनिवर्सिटी ऑफ वीगो जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ साझेदारी में पूरा किया गया।

डॉ. राधा का यह कार्य दर्शाता है कि हिमालयी पौधों पर आधारित पारंपरिक औषधियाँ आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल को नए प्रमाण-आधारित नवाचार दे सकती हैं, साथ ही जैव-विविधता संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।


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*** संक्षिप्त परिचय / बायोडाटा *** नाम: गोविन्द सिंह पुण्डीर संपादक: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल टिहरी। उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार। पत्रकारिता अनुभव: सन 1978 से सतत सक्रिय पत्रकारिता। विशेषता: जनसमस्याओं, सामाजिक सरोकारों, संस्कृति एवं विकास संबंधी मुद्दों पर गहन लेखन और रिपोर्टिंग। योगदान: चार दशकों से अधिक समय से प्रिंट व सोशल मीडिया में निरंतर लेखन एवं संपादन वर्तमान कार्य: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान करना।
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