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जल रहा जंगल

Govind Pundir
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-डा. दलीप सिंह बिष्ट

वण फुक्याली पोथळा फुक्याली, कनु निर्बान्टु ऐगी।

विनाशकाल विपरीत बुद्धि, तब इन हाल ह्वेगी।।

जगा-जगा आग लगाणा, पूछणा सरकार ख्या कनी।

व बुन्नी सब्बी तैयारी ह्वेगी, पर वण फुकेणा उन्नी।।

याक डाळा अर जीव मान पर, बचणू होयूं मुश्किल।

जैव-विविधता तबाह कन्ना जू, पकल्ड़ा होया दुश्कर।।

नदी बगणी सब्बी यख बिटी, पर पाणी कखी नीन।

वण सब्बी साफ कन्ना, पाणी कखी मिलदू नीन।।

वण फुकण पर रात दिन लग्या, बुन्ना गर्म ह्वेगी।

तबी त प्रकृति अपणू, विकराल रूप दिखौणी।।

सर्दी-गर्मी कू पता नी, कू मौसम कबरी औणू।

बिना मौसम बरखा बरखणी, तबाही कू मंजर होणू।।

अब्बी वक्त छी, समली सकदै त समली ल्या।

जब बर्बादी ह्वे जाली, तब हमसी ह्वाण क्या।।

वण फुक्याली पोथळा फुक्याली, कनु निर्बान्टु ऐगी।

विनाश काल विपरीत बुद्धि, तब इन हाल ह्वेगी।।


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*** संक्षिप्त परिचय / बायोडाटा *** नाम: गोविन्द सिंह पुण्डीर संपादक: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल टिहरी। उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार। पत्रकारिता अनुभव: सन 1978 से सतत सक्रिय पत्रकारिता। विशेषता: जनसमस्याओं, सामाजिक सरोकारों, संस्कृति एवं विकास संबंधी मुद्दों पर गहन लेखन और रिपोर्टिंग। योगदान: चार दशकों से अधिक समय से प्रिंट व सोशल मीडिया में निरंतर लेखन एवं संपादन वर्तमान कार्य: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान करना।
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