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जखिया: स्वाद व औषधीय गुणों से भरपूर लोकप्रिय पहाड़ी मसाला

Govind Pundir
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डॉ भरत गिरी गोसाईं

जखिया एक औषधीय पौधा है, जिसका प्रयोग औषधि निर्माण, मसाले तथा तड़के के रूप में किया जाता है। जखिया का वानस्पतिक नाम क्लोमा विस्कोसा है, जो कि कैपरेसी परिवार का सदस्य है। जखिया को जख्या, एशियन स्पाइडर फ्लावर, वाइल्ड डॉग या डॉग मस्टर्ड के नाम से भी जाना जाता है। भारत के पहाड़ी क्षेत्रों के अलावा पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, श्रीलंका आदि देशों मे भी जखिया मुख्यतः 800 से 1500 मीटर की ऊंचाई मे प्राकृतिक रूप में पाया जाता है।

जखिया एक लोकप्रिय पहाड़ी मसाला: 

जखिया के दाने काले, पीले तथा पूरे रंग के सरसों तथा राई के समान होते है। जखिया को मुख्यतः मसाले तथा तड़के के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आलू, लौकी, कद्दू, तुरई, बिन, पिनालू, राजमा की दाल, कढ़ी, आलू-मूली की सब्जी, गडेरी, हरी सब्जी आदि व्यंजनों मे जखिया के बीज का तड़का लगाया जाता है। जखिया मे पाये जाने वाला फ्लेवरिंग एजेंट  इसके अद्भुत स्वाद व जायके के लिए जिम्मेदार है। एक बीघा मे औसतन 168 किलोग्राम जखिया पैदा किया जा सकता है। जखिया ₹ 200 से ₹ 300 प्रति किलो बाजार में बेचा जाता है।

जखिया मे पाये जाने वाले पौष्टिक तत्व:

जखिया के बीज मे लगभग 18% फैटी एसिड तथा अमीनो एसिड पाया जाता है। इसके अलावा पर्याप्त मात्रा मे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, स्टार्च, विटामिन-सी, विटामिन-ई, मैग्निशियम, कैलशियम, पोटैशियम, सोडियम, मैग्नीज, आयरन तथा जिंक आदि तत्व पाए जाते है।

जखिया के औषधीय गुण: 

जखिया न केवल तड़के के रूप में इस्तेमाल किया जाता है बल्कि इसकी औषधीय महता भी बहुत है। जी०बी०पंत पर्यावरण संस्थान कोसी कटारमल (अल्मोड़ा) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ० आर० के० मैखुरी ने 1999 मे जखिया के महत्व पर एक महत्वपूर्ण शोध कार्य किया। उन्होंने बताया कि जखिया के बीज बुखार, खांसी, हैजा, एसिडिटी, गठिया, अल्सर आदि रोगों के उपचार मे प्रयोग किया जाता है। जखिया में मौजूद एसीसेप्टिक गुण के कारण इसका इस्तेमाल पहाड़ की परंपरागत चिकित्सा पद्धति मे किया जाता है। जखिया के नियमित सेवन से पेट से जुड़ी समस्याओं को दूर किया जा सकता है। जखिया मे फाइबर की अधिकता होती है जो कि पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है‌। जखिया के इस्तेमाल से लीवर में होने वाली सूजन तथा अन्य बीमारियों से भी बचाव किया जा सकता है‌। वैज्ञानिक शोध के अनुसार जखिया ऊर्जा का स्रोत भी है। भविष्य में जखिया का प्रयोग बायोफ्यूल के रूप मे किया जा सकता है। इस विषय पर शोध जारी है।


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*** संक्षिप्त परिचय / बायोडाटा *** नाम: गोविन्द सिंह पुण्डीर संपादक: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल टिहरी। उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार। पत्रकारिता अनुभव: सन 1978 से सतत सक्रिय पत्रकारिता। विशेषता: जनसमस्याओं, सामाजिक सरोकारों, संस्कृति एवं विकास संबंधी मुद्दों पर गहन लेखन और रिपोर्टिंग। योगदान: चार दशकों से अधिक समय से प्रिंट व सोशल मीडिया में निरंतर लेखन एवं संपादन वर्तमान कार्य: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान करना।
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