संसदीय प्रक्रियाओं का तथ्यपरक और व्यावहारिक दस्तावेज है ‘भारतीय संसद’

Govind Pundir
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भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल संविधान के लिखित प्रावधानों में नहीं, बल्कि उसे प्रभावी बनाने वाली संसदीय संस्थाओं, परंपराओं और प्रक्रियाओं में निहित है। संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही, जनप्रतिनिधित्व, नीति-निर्माण और शासन की पारदर्शिता का सर्वोच्च संस्थान है। ऐसे समय में, जब संसदीय कार्यप्रणाली को समझने की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है, देवेंद्र सिंह की पुस्तक ‘भारतीय संसद’ एक प्रामाणिक, तथ्यपरक और व्यावहारिक संदर्भ ग्रंथ के रूप में सामने आती है। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के लेखक लोकसभा सचिवालय में अपर सचिव रह चुके हैं, जिससे पुस्तक को विशेष विश्वसनीयता और प्रामाणिकता प्राप्त होती है।

देवेन्द्र सिंह असवाल लोकसभा सचिवालय में अपर सचिव रह चुके हैं और उन्होंने विधि सेवा के अधिकारी के रूप में तीन दशक से अधिक समय तक कार्य किया है। संसदीय कार्यप्रणाली, विधायी प्रक्रियाओं और संवैधानिक व्यवस्थाओं का उनका दीर्घ अनुभव पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में स्पष्ट रूप से झलकता है।

पुस्तक में भारतीय संसद के इतिहास, संवैधानिक प्रावधानों, विधायी एवं वित्तीय प्रक्रियाओं, प्रश्नकाल, संसदीय समितियों, विशेषाधिकारों और राजनीतिक व्यवस्था का संतुलित विश्लेषण किया गया है। लेखक लोकतंत्र को केवल पश्चिम की देन मानने की धारणा का खंडन करते हुए भारत की प्राचीन लोकतांत्रिक परंपराओं का उल्लेख करते हैं। साथ ही 1919 के अधिनियम से लेकर स्वतंत्र भारत की संसदीय यात्रा के प्रमुख पड़ावों, संविधान सभा की भूमिका, प्रथम लोकसभा से लेकर आधुनिक संसदीय व्यवस्था तक के विकासक्रम का भी तथ्यपरक वर्णन किया गया है।

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की संवैधानिक भूमिका, राष्ट्रपति की पुनर्विचार शक्ति, वीटो, दलबदल विरोधी कानून, लाभ के पद, संसद सदस्यों की अयोग्यता तथा संसदीय विशेषाधिकारों जैसे विषयों को सरल भाषा में समझाया गया है। लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति, लोक उपक्रम समिति तथा विभाग संबंधी स्थायी समितियों की भूमिका, उनके गठन, कार्यक्षेत्र और संसदीय नियंत्रण में उनकी उपयोगिता का प्रभावी विश्लेषण भी पुस्तक की विशेषता है। इससे पाठक को यह समझने में सहायता मिलती है कि संसद केवल सत्रों और बहसों तक सीमित नहीं, बल्कि निरंतर निगरानी और समीक्षा की एक सशक्त व्यवस्था भी है।

वित्तीय कार्यवाही से जुड़े अध्याय में बजट, विनियोग विधेयक, वित्त विधेयक, लेखानुदान, अनुपूरक अनुदान और कटौती प्रस्ताव जैसी जटिल प्रक्रियाओं को सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि किस प्रकार संसद सरकार के व्यय पर नियंत्रण रखती है और वित्तीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करती है। प्रश्नकाल पर आधारित अध्याय इसकी एक और प्रमुख उपलब्धि है, जिसमें उसके ऐतिहासिक विकास, प्रश्नों के प्रकार, तारांकित और अतारांकित प्रश्नों की प्रकृति तथा सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने में उसकी भूमिका का विस्तार से वर्णन है। इसी प्रकार संसद में बहस, शून्यकाल, नियम 377, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव और अन्य संसदीय प्रक्रियाओं का भी स्पष्ट विवेचन किया गया है।

लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियों, संसदीय समितियों की गोपनीयता, सदन की कार्यवाही के संचालन और विपक्ष के नेता की भूमिका पर भी पुस्तक उपयोगी जानकारी देती है। लेखक का संसदीय अनुभव इन विषयों के विश्लेषण को अधिक विश्वसनीय बनाता है और पाठक को व्यवहारिक दृष्टि से संसद की कार्यसंस्कृति समझने में मदद करता है। पुस्तक की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और तथ्यपरक है, जिससे यह केवल विशेषज्ञों के लिए ही नहीं, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी बन जाती है।

हालांकि पुस्तक हिंदी में है, लेकिन जेपीसी, मनी बिल, गिलोटिन जैसे प्रचलित अंग्रेज़ी संसदीय शब्दों के साथ उनके अंग्रेज़ी नाम भी दिए जाते तो पाठकों के लिए और अधिक उपयोगी होता। कुछ प्रमुख संसदीय समितियों तथा लोकसभा के विभिन्न नियमों—जैसे नियम 193, नियम 184, नियम 56 और अल्पकालिक चर्चा—का विवरण भी थोड़ा अधिक विस्तार से दिया जा सकता था। इससे पुस्तक का संदर्भ-मूल्य और भी बढ़ जाता तथा यह संसदीय अध्ययन के विद्यार्थियों के लिए अधिक व्यापक मार्गदर्शक बनती।

इन छोटी-छोटी सीमाओं के बावजूद ‘भारतीय संसद’ विषय की व्यापकता, तथ्यपरकता और व्यावहारिक दृष्टि के कारण हिंदी में संसदीय अध्ययन की अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। यह पुस्तक संसद की संरचना, कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को समझने के लिए एक भरोसेमंद आधार प्रदान करती है। विद्यार्थियों, शोधार्थियों, संसदीय पत्रकारों, जनप्रतिनिधियों और प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के लिए यह एक उपयोगी, विश्वसनीय और संग्रहणीय संदर्भ ग्रंथ है।

— कलूड़ा अभिनव
विशेष संवाददाता एवं यूनीवार्ता लोकसभा रिपोर्टर टीम के लीडर

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*** संक्षिप्त परिचय / बायोडाटा *** नाम: गोविन्द सिंह पुण्डीर संपादक: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल टिहरी। उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार। पत्रकारिता अनुभव: सन 1978 से सतत सक्रिय पत्रकारिता। विशेषता: जनसमस्याओं, सामाजिक सरोकारों, संस्कृति एवं विकास संबंधी मुद्दों पर गहन लेखन और रिपोर्टिंग। योगदान: चार दशकों से अधिक समय से प्रिंट व सोशल मीडिया में निरंतर लेखन एवं संपादन वर्तमान कार्य: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान करना।
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