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चिपको चेतना यात्रा पहुंची दून विश्वविद्यालय, गौरा देवी को भारत रत्न देने की मांग

Garhninad Desk
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देहरादून। उत्तराखंड के सुदूरवर्ती चमोली जिले के रैणी गाँव से प्रारंभ हुई चिपको चेतना यात्रा देहरादून के दून विश्वविद्यालय पहुंची। विश्वविद्यालय के डॉक्टर नित्यानंद हिमालय शोध केंद्र के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में आए हुए अतिथियों का स्वागत क्षेत्र प्रमुख श्री सुरेंद्र जी द्वारा किया गया।

कार्यक्रम में वृक्ष मित्र के नाम से प्रसिद्ध पर्यावरणविद् श्री विजय पाल बघेल ने संबोधित करते हुए कहा कि इस वर्ष को गौरा देवी जनशताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि गौरा देवी के योगदान को सम्मान देते हुए उनके नाम पर शोध संस्थान स्थापित किया जाए और उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाए। श्री बघेल ने चिपको आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 24 मार्च 1974 को जब सरकारी ठेकेदार रैणी गाँव में पेड़ों की कटाई के लिए पहुंचे, तब महिला मंगल दल की अध्यक्ष गौरा देवी ने गाँव की महिलाओं को एकजुट कर पेड़ों से लिपटकर विरोध किया। इस आंदोलन की खबर वॉशिंगटन पोस्ट सहित कई अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई थी। अंततः सरकार को 30 मार्च 1974 को पेड़ काटने के टेंडर को निरस्त करना पड़ा।

यात्रा में प्रमुख रूप से श्री महेश कुमार धीमान, श्री कुंदन सिंह टकोला, श्री महेश चड्ढ़ा, श्री जगत सिंह जंगली, श्री सच्चिदानंद भारती एवं कार्यक्रम के संयोजक श्री सुरेश सुयाल उपस्थित रहे। श्री सुरेश सुयाल ने बताया कि यह यात्रा 24 मार्च से 30 मार्च तक आयोजित की गई।

टिहरी राज परिवार के कुंवर ठाकुर भवानी प्रताप सिंह ने यात्रा का स्वागत करते हुए आगामी सरस्वती महाकुंभ के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह आयोजन श्री बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के अवसर पर माना गाँव के पास सरस्वती और अलकनंदा के संगम तट पर होगा, जिसमें उत्तर और दक्षिण भारत की संस्कृतियों का संगम देखने को मिलेगा। उन्होंने इस महाकुंभ के सफल आयोजन के लिए सभी से सहयोग की अपील की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व खादी ग्रामोद्योग अध्यक्ष और मोतिहारी विश्वविद्यालय, बिहार के कुलाधिपति डॉ. महेश शर्मा ने की। इस दौरान भैरव सेना के सदस्यों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। प्रमुख अतिथियों में राजगुरु श्री कृष्णानंद नौटियाल, ठाकुर श्री नरेंद्र सिंह राठौर, ठाकुर गौरव सिंह बर्त्वाल, लक्ष्मी प्रसाद जायसवाल आदि शामिल रहे।

इसके बाद यात्रा देहरादून से ऋषिकेश के लिए रवाना हुई, जहां गंगा आरती में सहभागिता की गई।


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