डॉ. सृजना राणा ‘शिखर’ के सशक्त अनुवाद ने नरेंद्र कठैत के गढ़वाली व्यंग्य साहित्य को हिंदी पाठकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया
देहरादून। गढ़वाली के प्रतिष्ठित व्यंग्यकार नरेंद्र कठैत के मानवीय अंगों पर आधारित व्यंग्य निबंधों का हिंदी अनुवाद ‘देह के पार’ व्यंग्य साहित्य की एक उल्लेखनीय कृति बनकर सामने आया है। डॉ. सृजना राणा ‘शिखर’ द्वारा किया गया यह अनुवाद मूल रचनाओं की संवेदना, व्यंग्य की धार और भाषाई सहजता को पूरी गरिमा के साथ हिंदी पाठकों तक पहुंचाने में सफल दिखाई देता है।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अतुल शर्मा ने पुस्तक की समीक्षात्मक टिप्पणी में लिखा है कि गढ़वाली व्यंग्य निबंधों का हिंदी अनुवाद अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण और सराहनीय कार्य है। डॉ. सृजना राणा ने न केवल मूल भावों को सुरक्षित रखा है, बल्कि व्यंग्य की तीक्ष्णता और भाषा की जीवंतता को भी पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत किया है।
पुस्तक का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि इसमें शरीर के विभिन्न अंगों को केंद्र में रखकर समाज, राजनीति, मानवीय स्वभाव और सामाजिक विसंगतियों पर गहरा व्यंग्य किया गया है। लेखक की भाषा सहज है, लेकिन उसके भीतर छिपे व्यंग्य के तीर सीधे पाठक की चेतना को झकझोर देते हैं।
‘दिमाग’ शीर्षक निबंध में लेखक लिखते हैं— “ऐसा समझो कि बंदूक किसी की, कंधा किसी और का और गोली वह खा रहा है, जिसकी कोई गलती ही नहीं।” वहीं दूसरी पंक्ति— “मुंह तो अब सुधरने से रहा, पर कान तो दिमाग की बात सुनते हैं”— वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर सटीक कटाक्ष करती है।
इसी प्रकार ‘नाक’ निबंध में लेखक प्रतिष्ठा और अहंकार पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं— “हम देखते हैं कि नाक हमेशा वस्त्रहीन रही। नाक क्या जाने इज्जत किसको कहते हैं?” ‘बाल’ शीर्षक व्यंग्य जीवन के अनेक आयामों को सरल शब्दों में सामने लाता है, जबकि ‘नाखून’ के माध्यम से समानता और भेदभाव की मानसिकता पर प्रहार किया गया है।
पुस्तक में ‘कान’, ‘जीभ’, ‘मूंछ’, ‘हड्डी’, ‘कमर’, ‘पेट’ और ‘घुटने’ जैसे व्यंग्य निबंध भी उतने ही प्रभावशाली हैं। ‘जीभ’ संवाद और संयम का महत्व बताती है तो ‘मूंछ’ झूठे मान-सम्मान की मानसिकता पर प्रश्न खड़े करती है। वहीं ‘घुटने’ की पंक्ति— “घुटनों की लड़ाई में नुकसान दोनों ने उठाया, लुटे दोनों ही, पर कमबख्त सुधरे नहीं”— मानवीय संघर्षों की विडंबना को बेहद प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है।
पुस्तक के आरंभ में लिखे अपने वक्तव्य में डॉ. सृजना राणा ‘शिखर’ ने नरेंद्र कठैत की लेखन शैली की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा है कि लेखक सरल भाषा में मुस्कुराते हुए ऐसे तीखे व्यंग्य-बाण छोड़ते हैं, जो सीधे पाठक के हृदय तक पहुंचते हैं। उनकी रचनाओं में हास्य के साथ-साथ गहन सामाजिक चेतना भी विद्यमान है।
डॉ. अतुल शर्मा के अनुसार ‘देह के पार’ व्यंग्य साहित्य और अनुवाद—दोनों ही दृष्टियों से एक महत्वपूर्ण कृति है। यह पुस्तक न केवल गढ़वाली साहित्य की समृद्ध व्यंग्य परंपरा से हिंदी पाठकों का परिचय कराती है, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि उत्कृष्ट अनुवाद किसी रचना की आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए उसे नए पाठक वर्ग तक सफलतापूर्वक पहुंचा सकता है।
पुस्तक परिचय
पुस्तक: देह के पार
मूल लेखक: नरेंद्र कठैत
अनुवादक: डॉ. सृजना राणा ‘शिखर’
प्रकाशक: इंडिया नेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, सेक्टर-19, नोएडा
मूल्य: ₹250




