हिंदू सम्मेलन में सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन और राष्ट्र कर्तव्यों पर हुआ विचार मंथन

टिहरी गढ़वाल 18 फरवरी। नरेंद्र नगर ब्लॉक अंतर्गत चाका में आयोजित हिंदू सम्मेलन में समाज, संस्कृति, पर्यावरण और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। सम्मेलन का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित कर समरस, स्वाभिमानी और कर्तव्यनिष्ठ भारत के निर्माण की दिशा में प्रेरित करना रहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों की सहभागिता रही।
सम्मेलन के मुख्य वक्ता सनातन धर्म विकास परिषद उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष एवं नृसिंह वाटिका आश्रम खांड गांव नंबर एक रायवाला हरिद्वार के परमाध्यक्ष नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि “हिंदू धर्म कोई संकीर्ण पूजा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र कला है।” उन्होंने कहा कि विश्व शांति और मानव कल्याण के लिए भारत में हिंदू समाज का एकजुट रहना आज नितांत आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि भारत एक शरीर है तो हिंदू उसकी आत्मा हैं और यह संबंध सनातन काल से चला आ रहा है।अपने संबोधन में हरीश चंद्र शर्मा जी ने कहा कि संगठित हिंदू समाज ही समर्थ भारत की नींव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदुत्वन किसी जाति तक सीमित है और न ही केवल पूजा पद्धति तक, बल्कि यह एक जीवन पद्धति है, जिसका मूल सूत्र “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” है। उन्होंने कहा कि भारत ने कोरोना काल में पूरी दुनिया को निःशुल्क दवाइयाँ उपलब्ध कराकर मानवता का उदाहरण प्रस्तुत किया।
उन्होंने इतिहास के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि समय के साथ चुनौतियों और शक्तियों का स्वरूप बदलता रहता है, लेकिन हिंदू चेतना सनातन बनी रहती है। उन्होंने प्रकृति के दोहन को केवल आवश्यकता तक सीमित रखने पर बल देते हुए कहा कि हिंदू विचारधारा मूलतः वैज्ञानिक और संतुलित है।
कार्यक्रम में ग्राम प्रधान चाका श्रीमती मंगेश उनियाल ने सामाजिक समरसता पर विचार रखते हुए कहा कि “एक पनघट और एक मरघट पर सभी भेद समाप्त हो जाते हैं, यही समरसता का वास्तविक स्वरूप है।” उन्होंने कहा कि भारत में जन्म लेना हमारा सौभाग्य है और प्रत्येक परिवार को वर्ष में कम से कम एक बार धार्मिक स्थलों की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। उन्होंने मातृशक्ति की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि परिवार को एकजुट रखने और धार्मिक-सांस्कृतिक संस्कार देने में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कुटुंब प्रबोधन पर बल देते हुए मंगेश उनियाल जी ने कहा कि प्रत्येक घर में ॐ और स्वस्तिक जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों का सम्मान, तुलसी का पौधा, स्वदेशी परिधान और मातृभाषा में संवाद होना चाहिए। उन्होंने भोजन के समय मोबाइल के स्थान पर पारिवारिक संवाद को प्राथमिकता देने, परिवार के साथ धार्मिक यात्राएँ करने और प्रातःकाल धरती माता के चरण स्पर्श जैसे संस्कारों को जीवन में अपनाने का आग्रह किया।
नागरिक कर्तव्यों और पर्यावरण संरक्षण पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि लाल बत्ती पर रुकना, रेल यात्रा में टिकट लेना, जल का सीमित उपयोग करना, पॉलीथिन का त्याग करना और प्रदूषण को रोकना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे अनुशासन ही बड़े सामाजिक परिवर्तन का आधार बनते हैं।
डॉ. हेडगेवार के विचारों का उल्लेख करते हुए मुख्य वक्ता सह प्रान्त प्रचारक चन्द्रशेखर जी ने कहा कि भारत के गुलाम होने के मुख्य कारण समाज की आत्मविस्मृति, संगठन और अनुशासन का अभाव तथा स्वाभिमान की कमी रहे हैं। उन्होंने आह्वान किया कि आज आवश्यकता है स्वदेशी अपनाने की, अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करने की तथा राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों को समझने की।
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि हिंदुत्व मानवता, करुणा, प्रकृति संरक्षण और विश्व कल्याण पर आधारित एक सनातन विचारधारा है। संगठित, स्वाभिमानी और संस्कारयुक्त समाज ही भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने की दिशा में अग्रसर कर सकता है। इस अवसर पर जगत असवाल, जोत सिंह असवाल, ज्योति पंत, संतोष पंत, आदित्य कोठारी, हिमांशु बिजल्वाण, धन सिंह सजवाण, शूरवीर सिंह गुंसाई, शेर सिंह पयाल, अमित असवाल, मुनेंद्र उनियाल, अमर तडियाल, गिरीश बंठवाण एवं बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे ।



