– नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज, अध्यक्ष, सनातन धर्म विकास परिषद उत्तर प्रदेश की कलम से
रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प का पर्व है। लेकिन जब यही पवित्र धागा राजनीति के मंच तक पहुंचता है और हजारों राखियां एक साथ नेताजी की कलाई पर सजने लगती हैं, तो मन में एक शरारती सवाल उठना स्वाभाविक है—यह रक्षाबंधन महोत्सव है या चुनावी राखी सम्मेलन?
मंच भव्य, सजावट शानदार, फूलों की खुशबू, कैमरों की चमक और सामने विराजमान नेताजी। बहनें कतार में आती हैं, राखी बांधती हैं और नेताजी बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं—“मैं आपकी रक्षा, सम्मान और विकास के लिए हमेशा खड़ा हूं।” दृश्य इतना भावुक कि अगर कैमरे न हों तो शायद भावनाएं भी थोड़ा संकोच कर जाएं!
लेकिन असली सवाल राखी बंधवाने का नहीं, राखी के बाद निभाए जाने वाले रिश्ते का है। बहनें मन ही मन पूछ सकती हैं—“भैया, आज तो हमारी याद आ गई, लेकिन कल से हमारा फोन भी उठेगा या अगली राखी तक फिर मुलाकात नहीं होगी?”
राजनीति में राखी का गणित भी बड़ा दिलचस्प है। घर में एक बहन राखी बांधे तो प्रेम, विश्वास और पारिवारिक रिश्ता। लेकिन जब हजारों बहनें एक मंच पर राखी बांधें तो कार्यक्रम का नाम हो जाता है—महिला सशक्तिकरण, जनसेवा, सामाजिक समरसता और जनसंपर्क। यानी एक धागा रिश्ते का और हजार धागे चुनावी गणित के!
मंच से “नारी शक्ति” की गूंज सुनाई देती है। नेताजी बहनों को सम्मान देने का संकल्प लेते हैं। तालियां बजती हैं, फोटो खिंचती हैं और सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल होती हैं। मगर असली परीक्षा तब होगी, जब कैमरे बंद हों, मंच हट जाए और किसी महिला को सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य या न्याय के लिए वास्तव में मदद की जरूरत पड़े।
राखी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसका धागा छोटा होता है, लेकिन वचन बहुत बड़ा। राजनीति में अक्सर उल्टा दिखाई देता है—वचन बहुत बड़ा और उसकी उम्र कभी-कभी सोशल मीडिया पोस्ट से भी छोटी!
चुनावी मौसम आते ही नेताओं को अचानक बहनों की याद बढ़ जाती है। किसी को नारी शक्ति दिखाई देती है, किसी को महिला सम्मान और किसी को भाई-बहन का पवित्र रिश्ता। मंच से वादों की बारिश होती है और जनता मन ही मन सोचती है—काश! इन वादों की उम्र भी पांच साल की होती।
रक्षाबंधन महोत्सव की सार्थकता तभी है, जब राखी केवल कलाई की शोभा न बने, बल्कि जिम्मेदारी की याद दिलाए। महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सम्मान और न्याय के लिए पूरे साल काम हो। क्योंकि एक दिन किसी महिला को “शक्ति स्वरूपा” कह देने से उसकी समस्याएं समाप्त नहीं होतीं।
इसलिए अगली बार जब कोई नेताजी रक्षाबंधन महोत्सव में हजारों राखियां बंधवाने बैठें, तो बहनों को भी राखी के साथ एक अदृश्य सवाल बांध देना चाहिए—
“भैया, रक्षा का वचन सिर्फ फोटो खिंचवाने तक है या पूरे पांच साल के लिए?”
और यदि नेताजी इस सवाल का जवाब कैमरे के सामने नहीं, बल्कि अगले पांच साल अपने काम से दे दें, तो समझिए—रक्षाबंधन महोत्सव सचमुच सफल हो गया।
वरना राखियां तो हर साल बंधती रहेंगी, मंच भी हर साल सजेंगे और कैमरे भी चमकते रहेंगे…
बस जनता यह जरूर याद रखे कि राखी की गांठ खुल सकती है, लेकिन जनता की याददाश्त नहीं।




