सनातन धर्म में शोक की मर्यादा और पर्व की पवित्रता—दोनों का सम्मान आवश्यक  — स्वामी रसिक महाराज 

Govind Pundir
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मृत्यु के शोककाल में बहन से राखी बंधवाना: शास्त्र सम्मत मार्गदर्शन

रायवाला 26 अगस्त । सनातन धर्म में रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह का पर्व नहीं, बल्कि रक्षासूत्र के माध्यम से मंगलकामना, सुरक्षा और पारिवारिक प्रेम की पवित्र परंपरा है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि कुल, गोत्र या परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए, तो क्या बहन भाई को राखी बांध सकती है?

इस विषय में नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज, अध्यक्ष सनातन धर्म विकास परिषद उत्तर प्रदेश (कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त) ने शास्त्रीय मर्यादा के आधार पर कहा कि मृत्यु के उपरांत जिन निकट संबंधियों को मृताशौच अथवा अशौच प्राप्त होता है, वे अशौच की निर्धारित अवधि में सामान्य मांगलिक एवं उत्सवात्मक कर्मों से विरत रहें। रक्षाबंधन में तिलक, पूजन, आरती और मंगलाचार का विधान होने से अशौचकाल में इसे सामान्य उत्सव की भांति करना उचित नहीं माना गया है।

धर्मशास्त्रीय परंपरा में सपिंड संबंधियों के लिए मृताशौच का विधान मिलता है। मनुस्मृति के अशौच-विधान में निकट सपिंड संबंधियों की मृत्यु पर शोक और अशौच की अवधि का वर्णन है।

इसी प्रकार निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु की परंपरा में भी यह सिद्धांत मिलता है कि अशौचकाल में मांगलिक एवं वैदिक कर्मों पर विशेष मर्यादा रखी जाती है। यदि किसी धार्मिक कर्म का विधिवत आरंभ पहले ही हो चुका हो, तो उसके संबंध में अलग शास्त्रीय अपवाद हो सकते हैं; परंतु ऐसे अपवादों को सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए।

स्वामी रसिक महाराज ने कहा कि “रक्षाबंधन के संबंध में ‘कुल या गोत्र में मृत्यु हुई है, इसलिए जीवनभर राखी नहीं बांधी जाएगी’ जैसी मान्यता का स्पष्ट शास्त्रीय आधार नहीं है। मृत्यु से उत्पन्न अशौच की जो अवधि संबंधित व्यक्तियों पर शास्त्रानुसार लागू होती है, उस अवधि का पालन करना चाहिए। शुद्धि के पश्चात बहन-भाई रक्षासूत्र बांध सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि हर मृत्यु पर पूरे गोत्र या दूर-दराज के सभी पारिवारिक संबंधियों को समान अवधि का अशौच नहीं लगता। अशौच की अवधि और उसका अधिकार संबंध की निकटता, सपिंडता तथा धर्मशास्त्रीय नियमों के अनुसार निर्धारित होता है। इसलिए केवल यह कह देना कि “गोत्र में किसी की मृत्यु हो गई है, अतः सभी लोग राखी नहीं बंधवाएंगे” शास्त्रसम्मत सामान्य नियम नहीं है।

शास्त्र सम्मत निष्कर्ष

यदि भाई या बहन स्वयं मृताशौच की निर्धारित अवधि में हैं, तो उस अवधि में रक्षाबंधन का उत्सवात्मक पूजन, तिलक और मांगलिक विधि से राखी बांधने से बचना चाहिए।

यदि मृत्यु दूर के संबंध में हुई है और भाई-बहन पर शास्त्रानुसार अशौच लागू नहीं होता, तो केवल “एक ही कुल या गोत्र” के आधार पर राखी बांधना निषिद्ध नहीं माना जा सकता।

अशौच की शुद्धि के पश्चात बहन भाई को श्रद्धा और विधिपूर्वक राखी बांध सकती है।

यदि रक्षाबंधन के दिन ही अशौच की स्थिति उत्पन्न हो जाए, तो शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार उत्सव स्थगित कर शुद्धि के बाद रक्षासूत्र बांधना अधिक उचित है।

स्थानीय कुलाचार और पारिवारिक परंपराओं का सम्मान करना चाहिए, किंतु वे धर्मशास्त्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत अंधानुकरण का कारण नहीं बनने चाहिए।

स्वामी रसिक महाराज ने कहा कि समाज को इस विषय में भ्रम और अफवाहों से बचना चाहिए तथा प्रत्येक परिवार अपनी परंपरा के विद्वान, आचार्य अथवा योग्य पुरोहित से संबंध की स्थिति बताकर निर्णय ले। सनातन धर्म में शोक की मर्यादा और पर्व की पवित्रता—दोनों का सम्मान आवश्यक है।

अतः सही शास्त्रीय मार्गदर्शन यही है कि जिस भाई या बहन को वास्तव में मृताशौच प्राप्त हुआ है, वह अशौचकाल में रक्षाबंधन के मांगलिक उत्सव से विरत रहे; अशौच समाप्त होने पर राखी बांध सकता या बंधवा सकता है। केवल कुल, गोत्र या दूर के परिवार में किसी की मृत्यु हो जाने मात्र से सभी लोगों के लिए रक्षाबंधन का निषेध मान लेना उचित नहीं है।

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*** संक्षिप्त परिचय / बायोडाटा *** नाम: गोविन्द सिंह पुण्डीर संपादक: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल टिहरी। उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार। पत्रकारिता अनुभव: सन 1978 से सतत सक्रिय पत्रकारिता। विशेषता: जनसमस्याओं, सामाजिक सरोकारों, संस्कृति एवं विकास संबंधी मुद्दों पर गहन लेखन और रिपोर्टिंग। योगदान: चार दशकों से अधिक समय से प्रिंट व सोशल मीडिया में निरंतर लेखन एवं संपादन वर्तमान कार्य: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान करना।
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