पहाड़ों की छाती छलनी और शहरों के माथे पर दाग!

@ सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’
कुछ समय पूर्व विवाहोत्सव में सम्मिलित होने जयपुर गया। साढ़े चार दशक पूर्व छात्र के रूप में शैक्षिक भ्रमण में पहली बार इस गुलाबी नगरी को देखा था। पुरानी स्मृतियों ताजी होती गई। पिछले माह प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिका ‘युगवाणी मासिक’ में जगमोहन रौतेला का लेख “नष्ट होती अरावली तो–” पढा। इसलिए ऐतिहासिक नगर की भू-पारिस्थितिकी ने अपनी ओर खींचा।
दैत्याकार इमारते हों या ऐतिहासिक किले, सब धरती के आंचल को कुरेदकर निर्मित हैं। असंख्य गरीब श्रमिकों के लहू से ये किले, महल और इमारतें अभिशप्त हैं। इन इमारतों और किलों के ध्वंसावशेषों को देखकर मुझे अपने जिले के कौशल दरबार, पुराना दरबार, राजगढ़ी, प्रताप शाह का महल आदि भी याद आ गए जो आज मृतप्राय भग्नावेश अवस्था में अवशेष मात्र हैं।

इतिहास बनाया जाता है जबकि भूगोल प्रकृति प्रदत्त है। इसलिए मैं इतिहास को जानकारी का साधन मानता हूं जबकि भूगोल स्वयं में साध्य है।जगमोहन रौतेला के लिए मेरी भावनाओं को उद्धैरित कर दिया और अरावली के पहाड़ियां,उनकी स्थिति और स्वरूप के प्रति,ऐतिहासिक इमारतों के प्रति देखने की ललक को फीका कर दिया।

जयपुर शहर तीन तरफ से अरावली पर्वतमालाओं से घिरा ऐतिहासिक शहर है। शहर की ढलान दक्षिण मुखी और दक्षिण पूर्व की तरफ है। सबसे ऊंची पहाड़ी नाहरगढ़ है। यह शहर वास्तुकला का बेजोड़ उदाहरण है। कहते हैं कि विद्याधर ने इस शहर को डिजाइन किया था। महाराजा सवाई जयसिंह ने 1727 को इस नगर को बसाया था जो आमिर के कछुवाह राजपूतों के राजधानी रहा। राजा जयसिंह द्वितीय ने अपनी राजधानी आमेर से जयपुर स्थापित की। महाराजा राम सिंह द्वितीय ने प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन पर, पूरे शहर को गुलाबी रंग में रंग दिया था। तब से शहर का नाम ही पिंक सिटी पड़ गया।

जयपुर शहर में हवा महल, सिटी पैलेस, नाहरगढ़ किला, जल महल, जयगढ़ आदि अनेक स्थलों को देखा लेकिन प्रताप नगर से हल्दीघाटी मार्ग होते हुए रामगंज के समीप से जब गुजरा तो शहर के माथे पर दाग दिखाई देने लगे। क्षेत्र की अरावली पहाड़ियों के घावों ने दर्द ताजा कर लिया। निर्माण कार्यों के लिए समय-समय पर पहाड़ और पहाड़ियों तथा धरती का दोहन किया गया लेकिन अतीत में नियोजित ढंग से पहाड़ियों का हाथों से श्रमिक कटान करते थे।समीपस्थ ही निर्माण कार्यों में भू सामग्री प्रयुक्त होती रही। आज दैत्याकार मशीनों से जब पहाड़ों की छाती छलनी की जाती है तो वह धरती की नासूर बन जाती है और लंबे इलाज के बाद भी या घाव नहीं भरते हैं। मैं अपने छोटे से ग्रामीण कस्बे चंबा के मसूरी रोड स्थित मानवकृत घाव से ही दुखी हूं जो कुछ समय पूर्व भू- माफिया की काली करतूतों का गवाह है और चंबा की नैसर्गिक सुंदरता पर दाग है। अवश्य श्रीदेव सुमन और वी सी गबरसिंह की आत्मा को भी दुख पहुंचता होगा।
जयपुर शहर को एक झलक पाने तथा दूर तलक विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक अरावली की पहाड़ियों को देखने के लिए मैं नाहरगढ़ के किले में पहुंचा।किले के बाहर- भीतर घूमा। माघवेंद्र भवन, जल संचय के लिए बनाए गए विशाल टैंक, चारों तरफ सुदृढ़ ऊंची- ऊंची दीवारें, आसपास के दृश्य, नाहरगढ़ का जयपुर वैक्स म्यूजियम, नाहर मंदिर आदि पुरातन की याद दिलाते हैं। किले के शीर्ष से जयपुर शहर का मनोहारी दृश्य, मानसागर झील, आमेर का किला आदि आकर्षक लगते हैं लेकिन सुदूर काटी गई खल्वाट पहाड़ियां उतना ही दर्द दी गई।
किले के भीतर अनेक परंपरागत हथियार, विलास भवन आदि ने अवश्य प्रभावित किया। सुखद अहसास इस बात का भी है कि शहर से दूर स्थित किलों के समीप अतिक्रमण नहीं है। लाखों पर्यटक रोज यहां आते हैं। हजारों लोगों के रोजी रोटी चलती है लेकिन कहीं झोपड़, खोखे या सड़क के किनारे अवैध निर्माण कार्य नहीं दिखाई दिया जैसे कि अपने उत्तराखंड में दिखाई देता है।
अरावली पर्वतमालाएं भारत के कई राज्यों से गुजरती हैं और कई प्रदेशों को मरुस्थल बनाने से रोकती हैं जैसे कि अपने पहाड़ों की शिवालिक पहाड़ियां हिमाचल से दून- द्वार होती हुई उत्तर प्रदेश के गोरखपुर होकर नेपाल की ओर चली जाती हैं। अरावली पर्वतमालाएं जैव विविधता, सदानीरा नदियों, जल स्रोतों और सुंदरता की स्रोत हैं। इन पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित पहाड़ियों का संरक्षण बहुत जरूरी है। यदि इन पहाड़ियों का अनियोजित और असंगत कटान किया गया तो पूरी पर्वत श्रृंखला की नींव कमजोर पड़ जाएगी और इसका खामियाजा कालांतर में पीढियां भुगतेंगी। फिलहाल शासन और सुप्रीम कोर्ट ने इन पहाड़ियों के कटान पर रोक लगा दी है।
जयपुर का इतिहास और भूगोल प्रत्यक्ष देखने के बाद अपने उत्तराखंड के ऋषिकेश पहुंचा तो 20-25 किलोमीटर चंबा की तरफ बगड़धार में घंटों फंसा रहा। शुष्क मौसम में भी ऑल वैदर रोड के कारण ऊपर से पहाड़ियों से बेतहाशा चट्टानें दरक रही हैं। ट्रीटमेंट चल रहा है। कितना कारगर होगा ? समय ही बताएगा। सिरवा बगड़, नारायण बगड़ आदि भूस्खलन से क्यों नहीं हम सबक लेते हैं ? पर्यटन के नाम पर आज पहाड़ों में दैत्याकार होटल बन रहे हैं।नरेंद्र नगर के ऊपर बड़े-बड़े होटल निर्माणाधीन हैं। नीचे कुमारखेड़ा, डौंर,गुजराडा आदि में तबाही का आलम है। क्या यही सुनियोजित विकास है ? नियोजित विकास केवल कागजी शब्द न रह जाए ! बल्कि धरातल पर भी दिखे। यह समय के पुकार है। यदि समय रहते हुए शासन- प्रशासन, स्थानीय समाज ध्यान नहीं देगा तो समस्त पहाड़ और पहाड़ियां भू- माफिया खा जाएगा। उत्तराखंड हो या राजस्थान, या देश का कोई और संवेदनशील भाग, प्रकृति का संरक्षण करते हुए पहाड़ और पहाड़ियों को बचना होगा ताकि पहाड़ों की छाती छलनी और शहरों के माथे पर दाग न लग सके।



