चातुर्मास में संयमित व सात्विक जीवन अपनाने का आह्वान
टिहरी गढ़वाल 15 सितम्बर । बौराड़ी में आयोजित शिव महापुराण कथा के दूसरे दिन मंगलवार को कथा व्यास डॉ. दुर्गेश आचार्य महाराज ने भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को सद्दृष्टि, शिव नाम के स्मरण और संयमित जीवन का महत्व बताया। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर भगवान शिव की कथा का श्रवण किया।
डॉ. दुर्गेश आचार्य महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में उसकी दृष्टि का विशेष महत्व होता है। व्यक्ति जैसी दृष्टि रखता है, उसके विचार और व्यवहार भी उसी के अनुरूप बनते हैं। दृष्टि में भेद आने से व्यक्ति का जीवन ही नहीं, बल्कि उसकी सृष्टि और आसपास का वातावरण भी प्रभावित होता है। इसलिए मनुष्य को सदैव सद्दृष्टि रखते हुए अच्छे विचारों और सत्कर्मों की ओर आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव का नाम स्वयं में कल्याणकारी है। शिव नाम के स्मरण से मनुष्य के भीतर सकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं और उसे जीवन में शांति तथा सद्मार्ग की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वाणी से शिव नाम का उच्चारण करें, नेत्रों से भगवान शिव के दर्शन करें और कानों से शिव कथा का श्रवण करें। यही भक्ति जीवन को सही दिशा देने का माध्यम बन सकती है।
कथा व्यास ने शिव महापुराण के प्रसंगों के माध्यम से भगवान शिव की आराधना और उनके स्वरूप की महिमा समझाई। उन्होंने कहा कि ऋषि-मुनि और सिद्ध महात्मा भी शिव नाम की उपासना करते रहे हैं। शिव की भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को संयम, सदाचार, सेवा और परोपकार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
चातुर्मास में संयमित और सात्विक आहार का महत्व
डॉ. दुर्गेश आचार्य महाराज ने चातुर्मास के दौरान खान-पान में संयम और सात्विकता अपनाने पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि चातुर्मास को भारतीय परंपरा में आत्मसंयम और साधना का महत्वपूर्ण समय माना गया है। इस अवधि में मनुष्य को अपने खान-पान, व्यवहार और दिनचर्या में अनुशासन लाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास के विभिन्न महीनों में परंपरानुसार कुछ खाद्य पदार्थों का त्याग किया जाता है। सावन में साग-पत्तेदार सब्जियों, भादों में दही तथा आश्विन में दूध के त्याग की परंपरा बताई गई है। कार्तिक माह में भी कुछ पदार्थों और उड़द-मसूर जैसी दालों से परहेज करने की बात कही गई है। इसके साथ ही मधु, तैल, अत्यधिक गरिष्ठ भोजन तथा लहसुन-प्याज आदि के सेवन से बचने की परंपरा का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि सात्विक आहार का उद्देश्य केवल खान-पान में बदलाव करना नहीं, बल्कि शरीर और मन दोनों को संयमित रखना है। नियमित दिनचर्या, संतुलित भोजन, सकारात्मक विचार और भगवान के नाम का स्मरण मनुष्य के जीवन में शांति और संतुलन स्थापित करने में सहायक होते हैं।
कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से शिव महापुराण का श्रवण किया। कथा स्थल पर भगवान शिव के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना रहा। आयोजकों ने श्रद्धालुओं से कथा के आगामी आयोजनों में भी अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर कथा श्रवण करने का आह्वान किया।
कथा में देहरादून से श्री सुमेर भट्ट सपरिवार, मंडप आचार्य हेमंत नौटियाल, कृष्ण बालक मिश्रा , राम रमैया भट्ट, कुलदीप नौटियाल, अनिल नौटियाल, कपिल देव उनियाल, कनिष्ठ प्रमुख प्रताप नगर विशन सिंह रांगड़, महावीर उनियाल, लक्ष्मण सिंह रावत, अनुसुया नौटियाल आदि मौजूद रहे।




