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मुंशी प्रेमचंद के जयंती पर राजकीय महाविद्यालय पाबौ मे आयोजित की गयी एक दिवसीय संगोष्ठी

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पौड़ी 31 जुलाई 2023। राजकीय महाविद्यालय पाबौ, पौड़ी गढ़वाल मे प्राचार्य प्रोफेसर सत्य प्रकाश शर्मा के अध्यक्षता एवं निर्देशन मे हिंदी विभाग तथा आई०क्यू०ए०सी० के संयुक्त तत्वाधान मे भारत के महान साहित्यकार, कहानीकार एवं उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद के जयंती के अवसर पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ प्राचार्य महोदय, विशिष्ट अतिथि महोदया तथा प्राध्यापको द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। तत्पश्चात छात्राओ द्वारा सरस्वती वंदना एवं स्वागत गीत प्रस्तुत किया गया। संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो० शर्मा ने “प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व” विषय पर विस्तृत व्याख्यान देते हुए बताया कि मुंशी प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था और उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के नज़दीक लमही गांव में हुआ था। पिता का नाम अजायब राय था और वे डाकखाने में मामूली नौकरी करते थे। वे जब सिर्फ आठ साल के थे तब मां का निधन हो गया। पिता ने दूसरा विवाह कर लिया लेकिन वे मां के प्यार और वात्सल्य से महरूम रहे।उनकी रचनाएँ आदर्शोन्मुख यथार्थवादी हैं, जिनमें सामान्य जीवन की वास्तविकताओं का सम्यक् चित्रण किया गया है। समाज-सुधार एवं राष्ट्रीयता उनकी रचनाओं के प्रमुख विषय रहे हैं। प्रेमचंद जी ने हिन्दी कथा-साहित्य में युगान्तर उपस्थित किया। विशिष्ट वक्ता एवं हिंदी विभाग के विभाग प्रभारी डॉ० सरिता ने मुंशी प्रेमचंद का साहित्य मे योगदान विषय पर व्याख्यान देते हुए बताया कि प्रेमचंद का रचना संसार बहुत बड़ा और समृद्ध रहा है। बहुआयामी प्रतिभा के धनी प्रेमचंद ने कहानी, नाटक, उपन्यास, लेख, आलोचना, संस्मरण, संपादकीय जैसी अनेक विधाओं में साहित्य का सृजन किया। उन्होंने 300 से ज़्यादा कहानियां, 3 नाटक, 15 उपन्यास, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें लिखी। इसके अलावा सैकड़ों लेख, संपादकीय लिखे जिसकी गिनती नहीं है। हालांकि उनकी कहानियां और उपन्यास उन्हें प्रसिद्धि के जिस मुकाम तक ले गए वो आज तक अछूता है।

विशिष्ट वक्ता एवं आई०क्यू०ए०सी० के नोडल अधिकारी डॉ० सौरभ सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए बताया कि प्रेमचंद का लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है, जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्ययन अधूरा होगा। वे एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा सुधी संपादक थे। हिंदी साहित्य मे उनका योगदान अतुलनीय है। श्रीमती तारावती शर्मा ने विशिष्ट अतिथि के रूप मे कार्यक्रम मे शिरकत की।

इस एक दिवसीय संगोष्ठी में डॉ० रजनी बाला, डॉ० सुनीता चौहान, डॉ० गणेश चंद्र, डॉ० मुकेश शाह, डॉ० जय प्रकाश पंवार सहित कर्मचारी एवं छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।


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