गौ, गंगा, गायत्री की उपेक्षा हिन्दू समाज को बर्दाश्त नहीं — नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज

ऋषिकेश । श्री गीता आश्रम स्वर्गाश्रम में वैदिक सनातन संस्कृति परिवार द्वारा गौ माता के पूजन और संत महात्माओं के ओजस्वी प्रवचन के साथ गोपाष्टमी महापर्व धूमधाम से मनाया गया।
इस अवसर पर भक्तों के सम्मुख अपने विचार प्रकट करते हुए हिन्दू धर्म गुरु नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज ने बताया कि वैदिक संस्कृति में गंगा स्नान, गोदान और गायत्री उपासना का विशेष महत्व है। जब साधक इन तीनों के भेदों को जानकर उपासना एवं पुण्य कर्म करता है, तो उसका कायाकल्प हो जाता है। भारतीय संस्कृति का मूल वेद विद्या है। यह ऋक्, यजुः और साम के रूप में प्रतिष्ठित है, अथर्व तो त्रयी का उपलक्षण है। त्रयी विद्या का ही संबंध अग्रित्रय से है। अग्रि, वायु और आदित्य इन तीन तत्वों से ही विश्व संचालित होता है। विराट पुरुष के तीन पैर ऊर्ध्व हैं और एक पैर विष्व के नाम से प्रतिष्ठित हैं। ज्ञान, कर्म और उपासना ये त्रयी का दूसरा स्वरूप है। इन्हीं के माध्यम से सत् चित आनंद अर्थात सच्चिदानंद की प्राप्ति होती है।, गंगा, गायत्री की उपेक्षा हिन्दू समाज को बर्दाश्त नहीं हो सकती।
कार्यक्रम में पधारे जगदगुरु स्वामी दयाराम दास जी ने अपने समापन संदेश में कहा कि संपूर्ण धर्म त्रिक में ही निहित हैं और यह त्रिक ही गायत्री, गंगा और गौ के रूप में प्रस्फुटित हुआ है। इसलिए गायत्री, गंगा और गौ तत्व में कोई अन्तर नहीं समझना चाहिए। प्रयागराज के संगम तट पर तीनों स्वरूप देखने को मिलते हैं, गंगा स्नान , गोदान तथा गायत्री उपासना। सामान्यतः हम गौ को पशु, गंगा को नदी, गायत्री को एक संप्रदाय का मंत्र मात्र मानते हैं, परंतु ऐसा नहीं है।
इस अवसर पर देवप्रयाग से आचार्य भाष्कर जोशी, केशव स्वरुप ब्रहमचारी, महन्त मनोज प्रपन्नाचार्य, संत अशोक हरि, रवि प्रपन्नाचार्य, डा जनार्दन कैरवाण, आचार्य सुभाष डोभाल, डा सतीश कृष्ण वत्सल ने अपने ओजस्वी बचनों से भक्तों को गाय माता की महिमा बताई। प्रवचन के बाद ब्रहमभोज का आयोजन किया गया।



