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खर जिउतिया पूजन

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एक माँ की स्मृति जीवित होती है
जीवित्पुत्रिका व्रत से
अनंत दुआएँ द्वार पर आती हैं
सभी संतानें साँपों से बच जाती हैं मुश्किल सफ़र में
विषम समय का विख सोख लेता है सूर्य
गाँव दर गाँव गूँजता है तूर्य

जगत पर टिमटिमाते जुगनुओं की रोशनी में
अढ़ाई अक्षरों के प्रेमपत्र को पढ़ती हैं किशोरियाँ
किलकारियों के कचकचाहटी स्वर में गाती हैं कजरियाँ

“सर्वे भवंतु सुखिनः’ सिद्धांत है हवा के होंठों पर
ऐ सखी! सृष्टि में फूल मरता है
पर उसका सौरभ नहीं
कलियाँ कंठों-कंठ कानों-कान सुनती रहती हैं
भ्रमरियों की गुनगुनाहट
और आहत तन-मन की आहट
मसलन ‘जीवन का राग नया अनुराग नया”

बाहर धूल भीतर रेत है
अंधेरी आँधियों में मणियों का मौन चमकना
साँप-साँपिन के संयोग का संकेत है
ओसों से बुझ रही है घास की प्यास
साथ छोड़ रहा है श्वास

पर, पेड़ को पता है
पत्तियों के पेट में जाग रही है भूख
कहीं नहीं है सुख
सूख रहा है ऊख

आश्विन-कृष्णा अष्टमी को
जीमूतवाहन जन्नत का वास छोड़कर पृथ्वी पर आते हैं
गरुड़ गगनगंगा में मलयावती के साथ नौका विहार करते हैं
जहाँ ढेर सारे किसान बादलराग गाते हैं

नयननीर की नदियों में शांति है
पर आँखों में क्रांति है
लालिमा बढ़ रही है
टूट रहा है विश्वास
रोष के रस से लबालब भरा है गिलास

गर्भवती अनुभूतियाँ जन्म दे रही हैं स्मृतियों को
जिन्हें जीउतिया माई अमरता का आशीर्वाद दे रही हैं
स्मृतियों के जीवित रहने से मनुष्यता जीवित रहती है

खैर, यह कोरोना के विरुद्ध छत्तिस घंटों का महासंकल्प है

इस वायरस-वर्ष ने प्रेम में नजदीकियों को नहीं,
दूरियों के तनाव को स्वीकार किया है
स्पर्श से दोस्ती में दरार पड़ रही है
कच्ची उम्र की बुभुक्षा लड़ रही है

पर्व को परवाह नहीं किसी के जीवन से
मृत्यु नहीं रुकती है किसी के रोकने से
नहीं रुकती हैं
कभी-कभी ख़ुद से ख़ुद की दूरियाँ बढ़ने से
दूरियों के बढ़ने से मन खिन्न है

गँवई शब्द मृत्यु की गंध को सूँघ रहे हैं
मरने से पहले एकत्र होकर
एक ही अगरबत्ती के धुएं को फेफड़े तक पहुँचा रहे हैं
डर के विरुद्ध

व्रतधारिन बूढ़ी औरतें
नयी नवेली बहुओं को उपदेश दे रही हैं
कि उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद है उपवास

चील्होर था या उल्लू फुसफुसा रही है भीड़
परात का प्रसाद लौट रहा है
चूल्हे के पास

बच्चे हैं
कि गोझिया आज ही खाना चाहते हैं
खर व्रतधारिन समझा रही हैं
जिउतिया माई रात भर खईहन
हम सब सवेरे
(प्रसाद बसियाने पर शीघ्र शक्ति प्रदान करता है, वत्स!)

बच्चे कह रहे हैं माई हमार हिस्सा हमें दे दे
नाहीं त रतिया में जिउतिया माई कुल खा जईहन
आज शायद ही छोटे बच्चे सो पाएंगे ठीक से
व्रत की बात हट रही है लीक से

यह लोकपर्व मातृशक्ति की तपस्या है!!

©गोलेन्द्र पटेल


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Govind Pundir

*** संक्षिप्त परिचय / बायोडाटा *** नाम: गोविन्द सिंह पुण्डीर संपादक: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल टिहरी। उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार। पत्रकारिता अनुभव: सन 1978 से सतत सक्रिय पत्रकारिता। विशेषता: जनसमस्याओं, सामाजिक सरोकारों, संस्कृति एवं विकास संबंधी मुद्दों पर गहन लेखन और रिपोर्टिंग। योगदान: चार दशकों से अधिक समय से प्रिंट व सोशल मीडिया में निरंतर लेखन एवं संपादन वर्तमान कार्य: गढ़ निनाद न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान करना।

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