मकर संक्रांति से होती है देवताओं के दिन की गणना का शुभारंभ : पंडित तरसेम वत्स

फरीदाबाद। मकर संक्रांति सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन एवं वैज्ञानिक महत्व से जुड़ा पर्व है। अखिल भारतीय मानव कल्याण ट्रस्ट द्वारा धर्म और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निरंतर किए जा रहे कार्यों के क्रम में ट्रस्ट के राष्ट्रीय सचिव पंडित तरसेम वत्स ने मकर संक्रांति के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
पंडित तरसेम वत्स ने बताया कि मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ मनाया जाता है। इसी के साथ सूर्य उत्तरायण होते हैं और खरमास समाप्त होने के बाद शुभ कार्यों का आरंभ होता है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन से देवताओं के दिन की गणना प्रारंभ मानी जाती है। दक्षिणायन के छह माह को देवताओं की रात्रि तथा उत्तरायण के छह माह को देवताओं का दिन कहा गया है।
उन्होंने कहा कि सामान्यतः भारतीय पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित होता है, लेकिन मकर संक्रांति एकमात्र ऐसा पर्व है, जो सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। सूर्य का कर्क और मकर राशि में प्रवेश विशेष महत्व रखता है, जो छह-छह माह के अंतराल पर होता है। पृथ्वी की धुरी के 23.5 अंश झुके होने के कारण सूर्य छह माह उत्तरी और छह माह दक्षिणी गोलार्द्ध के समीप रहता है।
मकर संक्रांति का वैज्ञानिक पक्ष बताते हुए उन्होंने कहा कि उत्तरायण के साथ ही प्रकृति में सकारात्मक परिवर्तन आरंभ होता है। शीत ऋतु की तीव्रता धीरे-धीरे कम होने लगती है और जीवन में ऊर्जा एवं प्रकाश का संचार होता है। भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित होने के कारण यह पर्व यहां विशेष महत्व रखता है।
पंडित वत्स ने बताया कि मकर संक्रांति पूरे भारत में विभिन्न नामों से मनाई जाती है। उत्तर भारत में मकर संक्रांति, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में माघ बिहू के रूप में यह पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। नाम भले ही अलग हों, लेकिन मूल भाव सूर्य उपासना और दान-पुण्य ही है।
धार्मिक कथाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि महाभारत काल में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर मकर संक्रांति के दिन ही प्राण त्याग किए। इसके अलावा गंगा अवतरण और यशोदा माता द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को पुत्र रूप में प्राप्त करने से जुड़ी कथाएं भी इस पर्व से संबंधित हैं।
मकर संक्रांति पर तिल का विशेष महत्व है। तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल के तेल से मालिश, तिल की आहुति, तिल का सेवन और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है तथा पापों का नाश होता है।
इस शुभ अवसर पर अखिल भारतीय मानव कल्याण ट्रस्ट के संस्थापक डॉ. हृदयेश कुमार एवं ट्रस्ट के पदाधिकारियों द्वारा शिव मंदिर परिसर, बल्लभगढ़ में भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।



